जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय, श्रीनगर पीठ ने 14 मई, 2026 को उच्चारित अपने निर्णय में डॉ. अब्दुल मजीद भट, जो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, गुरवैथ, खान साहिब, बडगाम में तैनात एक चिकित्साधिकारी हैं, द्वारा दायर क्रमागत जमानत याचिका स्वीकार कर ली। याचिकाकर्ता 14 जनवरी, 2026 से भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 62 और 64 के अंतर्गत पंजीकृत प्राथमिकी संख्या 10/2026 में निरन्तर न्यायिक अभिरक्षा में थे। इस मामले की सुनवाई माननीय श्री न्यायमूर्ति मोहम्मद यूसुफ वानी ने की।

यह मामला उस घटना से उत्पन्न हुआ जब परिवादिनी मस्त. दिलशाद अख्तर 14 जनवरी, 2026 को स्त्री रोग संबंधी संक्रमण के उपचार हेतु उक्त स्वास्थ्य केन्द्र पहुँची। उसने आरोप लगाया कि ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक ने उसे एक अलग कमरे में ले जाकर उसकी ननद को साथ आने से मना कर दिया, कपड़े उतारने को कहा, उसके साथ दुर्व्यवहार किया और बलात्कार का प्रयास किया, जिसका उसने विरोध कर भागकर सामना किया। उसी दिन प्राथमिकी दर्ज कर अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया। विचारण न्यायालय द्वारा 25 मार्च, 2026 को BNS की धारा 62/64 के अंतर्गत आरोप तय किए गए और पूर्व में दायर जमानत आवेदन विचारण न्यायालय द्वारा नामंजूर किया जा चुका था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्राथमिकी और जाँच रिपोर्ट के कथनों में स्पष्ट विरोधाभास है, BNS की धारा 63 के अंतर्गत चिकित्सीय परीक्षण संबंधी वैधानिक अपवाद का संरक्षण प्राप्त है, तथा लम्बे समय तक पूर्व-विचारण निरोध विचारण-पूर्व दण्ड के समतुल्य है। अभियोजन पक्ष ने प्रतिवाद करते हुए कहा कि चिकित्सक ने अपनी व्यावसायिक विश्वस्त स्थिति का दुरुपयोग किया, अपराध घोर और वीभत्स प्रकृति का है, साक्षियों को प्रभावित किए जाने की आशंका है तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के सामाजिक परिणाम गम्भीर होते हैं।

न्यायालय ने आरोप की गम्भीर प्रकृति को स्वीकार करते हुए भी यह पाया कि अभियुक्त लगभग पाँच माह से अभिरक्षा में है, विचारण प्रगति पर है और महत्त्वपूर्ण साक्षियों के बयान दर्ज हो चुके हैं, तथा अभिरक्षा की अनिवार्य आवश्यकता का कोई ठोस आधार नहीं है। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि मृत्युदण्ड या आजीवन कारावास से दण्डनीय न होने वाले गैर-जमानती अपराधों में जमानत नियम है और उसका अस्वीकार अपवाद।

न्यायालय ने अनेक महत्त्वपूर्ण न्यायिक दृष्टान्तों पर विश्वास व्यक्त किया — राजस्थान राज्य बनाम बालचन्द (AIR 1977 SC 2447) में प्रतिपादित "जमानत दो, जेल नहीं" के मूल सिद्धांत पर; संजय चन्द्र बनाम CBI (AIR 2012 SC 830) में पूर्व-विचारण निरोध को संविधान के अनुच्छेद 21 के विपरीत दण्डात्मक उपाय बताने पर; दातारम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2018) में मानवीय न्यायिक विवेक के प्रयोग पर; पंकज जैन बनाम भारत संघ (2018) में केवल अपराध की गम्भीरता को जमानत अस्वीकार का आधार न माने जाने के सिद्धांत पर; तथा गुर बख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य (AIR 1980 SC 1632) में जमानत विचारण हेतु सम्मिलित परिस्थितियों के महत्त्व पर।

न्यायालय ने जमानत ₹1,00,000/- के व्यक्तिगत बन्धपत्र एवं ज़मानतपत्र पर प्रदान की गई, साथ ही कठोर शर्तें लगाई गईं कि अभियुक्त परिवादिनी को किसी भी रूप में भयभीत नहीं करेगा, साक्षियों से छेड़छाड़ नहीं करेगा, न्यायालय की अनुमति के बिना भारत नहीं छोड़ेगा और किसी भी अपराध को नहीं दोहराएगा।

Case details:

Case No.: Bail App No. 15/2026 with CrlM No. 150/2026

Bench: Hon'ble Mr. Justice Mohd Yousuf Wani

Petitioner: Dr. Abdul Majeed Bhat

Respondent: Union Territory of J&K through SHO, Police Station Khan Sahib, Budgam

Petitioner's Counsel: Mr. Umar Rashid Wani

Respondent's Counsel: Mr. Bikramdeep Singh, Dy. AG

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